राष्ट्रपति से पदमश्री का पुरस्कार पाने वाले एचसी वर्मा कौन हैं और उनका योगदान क्या है ?

जो लोग अंग्रेजी को पढ़ना, समझना और सीखना चाहते हैं। उनके लिए रेन एंड मार्टिन की किताब हाई स्कूल इंग्लिश ग्रामर एंड कंपोजिशन किसी धर्म ग्रंथ से कम नहीं है।

ठीक उसी प्रकार एचसी वर्मा की किताब कॉन्सेप्ट्स आफ फिजिक्स इंजीनियर छात्रों के लिए एक धर्म ग्रंथ ही है।

आजाद भारत के इतिहास में एकेडमिक्स की किताबों में शायद ही किसी किताब ने इतनी प्रसिद्धि हासिल की होगी जितनी भी एस सी वर्मा की कॉन्सेप्ट्स आफ फिजिक्स ने हासिल की है।

इन्हीं डॉक्टर वर्मा को 8 नवंबर 2021 को भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पदमश्री से सम्मानित किया है।

एससी शर्मा को पदम श्री देने की घोषणा साल 2020 में की जा चुकी थी लेकिन पिछले साल कोरोनावायरस चलते ऐसा कर पाना संभव नहीं था।

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी ट्वीट करके लिखा है कि
विज्ञान और इंजीनियरिंग के लिए डॉ हरीश चंद्र वर्मा को पदमश्री से पुरस्कृत किया गया है।

डॉक्टर वर्मा भौतिक विज्ञान के शिक्षक और शोधकर्ता हैं। डॉक्टर वर्मा अपनी किताब कॉन्सेप्ट्स आफ फिजिक्स के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं।

उनकी किताब दो भागों में विभाजित है। इस किताब ने फिजिक्स की दुनिया में क्रांति ला दी है।

एचसी वर्मा का जीवन परिचय

एचसी वर्मा का जन्म 8 अप्रैल 1952 को बिहार के दरभंगा में हुआ था। एचसी वर्मा के पिता जी एक ही स्कूल में सरकारी अध्यापक थे।

वर्मा जी की प्रारंभिक शिक्षा सीधी कक्षा 6 से ही प्रारंभ हुई थी। उन्होंने अपने विधार्थी जीवन का ज्यादातर समय पटना में ही बिताया।

यहीं से उनकी पढ़ाई हुई थी। हरीश चंद्र वर्मा आईआईटी कानपुर में भौतिकी विभाग के प्रोफेसर रह चुके हैं।

फिलहाल वे अब सेवानिवृत्त हैं। इससे पहले उन्होंने पटना विश्वविद्यालय के विज्ञान कॉलेज में लेक्चरर भी रह चुके हैं।

न्यूक्लियर फिजिक्स उनका पसंदीदा विषय है। अब तक उनके कई 150 शोध पत्र कई जर्नल्स में प्रकाशित हो चुके हैं।

उनकी एक छोटी सी वीडियो क्लिप इंटरनेट पर वायरल हो रही है। इसमें डॉक्टर वर्मा अपनी पढ़ाई की रुचि के संबंध में एक छोटी सी घटना का जिक्र कर रहे हैं।

इस वीडियो में डॉ शर्मा कह रहे हैं कि मेरी मां ने मुझे हर घंटे के हिसाब से दो ठेकुए खाने की शर्त रखी थी।

वे ठेकुए तभी मिलेंगे जब मैं अपने साथ कॉपी पेन और बुक लेकर बैठूंगा। मेरी मां ने मुझे पढ़ने और न पढ़ने की कोई शर्त नहीं रखी थी।

बाल मन था तो लगा कि अगर शर्त में पढ़ना शामिल नहीं है तो फायदे की बात है। मैं एक कमरे में जाकर बैठ गया।

पांच 10 मिनट बाद बोर होने लगा तो मन में ख्याल आया कि क्यों ना किताब के पन्ने ही पलट लिए जाएं तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि पढ़ना इतना बुरा भी नहीं है जितना मैं समझता हूं।

एचसी शर्मा बताते हैं कि मेरे साथ यह पहली घटना थी कि जब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैं किताब की हर एक चीज को बड़े ध्यान से पढ़ रहा हूं। उधर ठेकुए भी मिलने थे दो ठेकुए प्रति घंटा तो उस महीने खूब ठेकुए कमाए।

न केवल ठेकुए कमाए बल्कि उसके बाद हुए एग्जाम्स में भी अच्छे नंबर आए। पुरानी कहावत है ना कि शुरू मजबूरी में मजबूरी में किए थे अब मजा आने लगा। उसी तर्ज पर डॉक्टर एस सी वर्मा ने बुलंदियों को छू लिया।

अपनी पढ़ाई के बारे में एचसी शर्मा बताते हैं कि 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने किसी आईआईटी इंजीनियरिंग कॉलेज जाने से बेहतर बीएससी करना उचित समझा।

उसके बाद उन्होंने आईआईटी कानपुर से एमएससी और पीएचडी कंप्लीट की।

1979 में जब उनके शिक्षकों को ऐसा महसूस हो रहा था कि ब्राइट माइंड का देश से पलायन निश्चित है।

तब उन्होंने शिक्षक बनने की ठानी और उसी विद्यालय में पढ़ाने लगे थे जहां पर से उन्होंने बीएससी की थी। 15 साल तक उन्होंने वहीं पर शिक्षण कार्य किया।

बाद में 1994 में आईआईटी कानपुर ज्वाइन कर लिया। 30 जून 2017 को उनका आईआईटी कानपुर से ही रिटायरमेंट हो गया।

फिलहाल इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजिक्स टीचर की कार्यसमिति के सदस्य हैं।

भले ही डॉक्टर वर्मा आज इतने बड़े-बड़े काम कर चुके हैं लेकिन इसके बावजूद वे अपनी किताब कॉन्सेप्ट्स आफ फिजिक्स के लिए ही पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं।

प्रोफेसर एच सी वर्मा से जब पूछा गया कि यह किताब लिखने का आईडिया आपको कहां से आया तब भी बताते हैं कि जब भी पटना में शिक्षण कार्य कर रहे थे। तब उनके दिमाग में इस तरह की किताब लेने का विचार आया था।

उस जमाने में फिजिक्स की ज्यादातर किताबें या तो अंग्रेजी में होती थी या फिर अन्य भाषाओं से अंग्रेजी में अनुवाद की हुई होती थी।

यहां पर छात्रों की समस्या से अंग्रेजी ही नहीं थी बल्कि वह किताबों में दिए गए रिफरेंस भी अजीब तरह के दिए जाते थे।

गांव देहात के क्षेत्रों से आने वाले हैं स्टूडेंट के लिए फिजिक्स के काॅसेप्ट समझना दूर की कौड़ी होते थे।

विद्यार्थियों की इस समस्या को समझा और उनको इस समस्या से निजात दिलाने के लिए 8 साल तक का संघर्ष किया और कॉन्सेप्ट्स आफ फिजिक्स नाम से पहले एडमिशन छप गया।

एचसी वर्मा बताते हैं कि दशकों बाद जब हम इस किताब को दोबारा देखते हैं तब मुझे आज भी इसमें बहुत सारी कमी नजर आती है कमियां फैक्चुअल नहीं वल्कि फॉर्मेट की हैं।

अंत में आप इतना भी समझ लीजिए यह किताब एकेडमिक के लिए नहीं लिखी गई थी बल्कि केवल फिजिक्स को आसान भाषा में समझाने के लिए लिखी गई थी।

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