तालिबान के अफगानिस्तान में काबिज होने पर जेहादियों कहा ये अल्लाह का संदेश

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता पर वापसी को तमाम जिहादी संगठन अमेरिकी सेना के खिलाफ तख्तापलट मान रहे हैं।

20 साल पहले अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला करने के लिए जिम्मेदार आतंकी संगठन अल कायदा ने अमेरिकी सेना की इस तरह वापसी को तालेबान की ऐतिहासिक जीत बताया है।

इसके लिए उसने तालिबान को बधाइयां दी हैं। ऐसा ऐसे समय में हो रहा है जब तमाम पश्चिमी देश मुस्लिम बहुल देशों से अपनी सेनाओं को हटा रहे हैं।

ऐसे में बहुत सारे जिहादी संगठन उन पर नजर गड़ाए बैठे हैं।

अमेरिका पर हुए आतंकी हमले को 20 साल बीत चुके हैं। लेकिन इसके बाद भी इस तरह की और घटनाएं होने की आशंकाएं बरकरार हैं।

वह भी तब जब इस्लामिक स्टेट जैसा दुर्दांत जिहादी संगठन अस्तित्व में हो।

हमने इस लेख में विश्व पटल पर जिहादी संगठनों की स्थिति और उनमें भी अल कायदा की वर्तमान परिस्थिति का विस्तार से विश्लेषण किया है।

अमेरिका का जाना अल्लाह की ओर पवित्र संदेश

अभी अमेरिका सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी को एक महीना भी नहीं बीता है।

तमाम जिहादी संगठन शनिवार को तालिबान की सत्ता हथियाने पर बधाई दे रहे हैं।

उनका कहना है कि तालिबान की वापसी अल्लाह की ओर से पवित्र संदेश है। हालांकि इस्लामिक स्टेट ने अभी तक तालिबान को बधाई नहीं दी है।

सभी संगठन अमेरिका का जाना एक ऐसी सुबह के तौर पर देख रहे हैं जब अमेरिका के अलावा अन्य पश्चिमी देश इस्लामिक देशों में अभियानों से तंग आ चुके हैं।

कहीं-कहीं तो वे क्षेत्रीय जिहादी ताकतों से हार मान रहे हैं। सभी आतंकी संगठन अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी को जिहाद की जीत बता रहे हैं।

इसे अमेरिका की हार भी बता रहे हैं। अमेरिका ही नहीं बल्कि फ्रांस ने भी माली में अपने कदम पीछे हटाने के संकेत दिए हैं।

अमेरिका की तरह फ्रांस भी यहां बीते कई सालों से जिहादी संगठनों के खिलाफ युद्ध लड़ रहा है।

एशिया से हट कर पश्चिमी अफ्रीका में भी यही हाल है। यहां पर अलकायदा और आईएस दोनों ही मुख्य प्रतिद्वंदी हैं।

इतना ही नहीं अमेरिका ने इराक और सीरिया से भी अपनी मौजूदगी घटाने का ऐलान किया है।

इसके अलावा इसी साल जनवरी में अमेरिका ने सोमालिया को भी आजाद कर दिया है। जिहादी संगठन ऐसे देशों पर अपनी नजर गड़ाए बैठे हैं।

जेहादी संगठनों का मानना है कि कोविड-19 के अलावा अमेरिका में इस समय देश के खिलाफ प्रदर्शन और आंदोलन चल रहे हैं।

ऐसे में अमेरिका अपने देश की समस्याओं में इतना उलझ जाएगा कि वह बाहर के देशों पर विशेष ध्यान नहीं दे पाया।

अलकायदा ने अपने लड़ाकों को कहा है कि आने वाले समय में उनके लिए अपार संभावनाएं हैं इसीलिए तैयारियां पूरी कर लो।

अलकायदा और इस्लामिक स्टेट दोनों ही एक दूसरे के प्रतिद्वंदी संगठन हैं।

इन दोनों में अब तक किसी तरह की कोई समझौते की गुंजाइश नहीं देखने को मिली है।

पश्चिमी देशों की सैन्य ताकतों से नहीं बल्कि अमेरिकी ड्रोन से जिहादी संगठन खौफजदा हैं।

इन समूहों को मानना है कि यदि अमेरिका उन पर हमला ना करें तो वे स्थानीय संगठनों से आसानी से फतह हासिल कर सकते हैं।

तालिबान का माॅडल ही सबसे अच्छा

सभी आतंकी संगठन तालिबान की जीत पर जश्न मना रहे हैं। तालिबान की जीत को प्रेरणादायक कहकर प्रचारित कर रहे हैं।

सोमालिया में अलकायदा का ही दूसरा संगठन अल शबाब अमेरिकी और बाकी पश्चिमी देशों के जिहाद के खिलाफ चल रहे अभियानों से खुद को बचाने में सफल रहा है।

यहां तक बताया जाता है कि वह सोमालिया में मजबूत ही हुआ है।

इसके अलावा उत्तरी सीरिया में भी सक्रिय आतंकी संगठन हयात तहरीर अल साम को भी आप तालिबान के रूप में ही जान सकते हैं।

यह संगठन न केवल सीरिया की सत्ता हासिल करना चाहता है बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदायों और संगठनों से खुद को मान्यता देने के प्रयास भी कर रहा है। लेकिन तालिबान बनना आसान नहीं है।

इसके लिए जरूरी है कि वह सीरिया में मौजूद प्रशासनिक और शासनिक मॉडल को चोट करें और लंबे समय तक संघर्ष करें।

तालिबान की तरह एक लंबे अभियान की आवश्यकता होगी। इन सबके अलावा तालिबान की सबसे खास बात यह थी कि वह लचीलापन और व्यवहारवाद दोनों ही तरह से कार्य करता है।

तालिबान के काम करने के तरीके को देख रहे और जेहादी संगठन

लगभग सभी जिहादी संगठन तालिबान को अपना रोल मॉडल मानने लगे हैं।

क्योंकि वे इस बात को भलीभांति समझ चुके हैं की इस्लामिक स्टेट का भी तरीका है वह अल्पकालिक तो हो सकता है। लेकिन दीर्घकालिक व्यवहारिक नहीं हो सकता।

लेकिन कई बार जरूरत से ज्यादा लचीलापन और व्यावहारिकता जिहादी समूहों में उनकी विश्वसनीयता खो देती है। जैसा कि हयात अल साम के मामले में हुआ था।

अल साम बहुत लचीला व्यवहार करने लगा है जिस कारण अन्य आतंकी संगठन उस पर भरोसा नहीं कर पा रहा हैं।

इसी साल मई में अलकायदा भी अपने समर्थकों की आलोचना का शिकार हुआ था।

मामला यह था कि इसराइल और फ़लस्तीनी में संघर्ष हुआ था तब अलकायदा ने हमास के लिए सांत्वना संदेश भेजे थे।

हमास भले ही एक जेहादी संगठन है लेकिन वह राजनेताओं और लोकतांत्रिक तरीकों की बात करता है।

यही कारण है कि ज्यादातर जेहादी संगठन हमास की इस नीति की आलोचना करते हैं।

वर्तमान समय में सभी आतंकी संगठन तालिबान के प्रशंसा कर रहे हैं लेकिन उनकी निगाहें इस बात पर भी लगी हुई है कि तालेबान अपना प्रशासन कैसे चलाता है ?

वह अपने देश में शरिया को किस प्रकार लागू कर पाता है।

यदि तालिबान अपने राज्य में इसी तरह का लचीलापन दिखाता है तब जिहादी भेड़िए इस पर कुछ ना कुछ जरूर बोलेंगे।

अभी तो ठीक से शुरुआत भी नहीं हुई है कि अल कायदा के कुछ नेता तालिबान की लचीली नीति की आलोचना भी करने लगे हैं।

अगर हम उदाहरण की बात करें तो तालिबान ने धार्मिक अल्पसंख्यकों और पड़ोसी देशों से जो संपर्क बनाने की कोशिश की है।

वह किसी भी रूप में स्वीकार नहीं की जा रही है। तालिबान इसी नशीली नीति का इस्लामिक स्टेट फायदा उठा सकता है।

वह तालिबान की लचीली नीतियों को खारिज करने का प्रयास कर रहा है कि तालिबान लचीला हो गया है।

ऐसा करके वह तालिबान के लड़ाकों को अपनी तरफ आकर्षित करने का भरपूर कोशिश कर रहा है।

अल कायदा और उसका अस्तित्व

अन्य संगठन अस्तित्व आने के बाद अल कायदा को अब वह तवज्जो नहीं मिल पा रही है। अभी हाल ही के वर्षों में अलकायदा के नेताओं को कई झटके लगे हैं।

माना जाता है कि अब अलकायदा केवल बयान बाजी तक ही सीमित रह गया है।

तमाम देशों में अलकायदा के ब्रांच संगठन केवल निचले दर्जे की सैनिक कार्रवाई तक ही सीमित रह गए हैं।

पिछले साल एक अफवाह उड़ी थी कि अलकायदा के नेता अल जवाहिरी की मौत हो गई है। अलकायदा और उसके संगठन उसकी मौत की खबरों का ठीक से खंडन भी नहीं कर पाए।

गुप्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जवाहिरी की या तो मौत हो गई है नहीं तो सिर्फ एक काम करने के लायक नहीं बचा।

लेकिन इस संबंध में किसी नेता ने अभी तक कोई भी बयान जारी नहीं किया है।

लेकिन अलकायदा की इस स्थिति को यदि आप यह कहें कि अलकायदा कमजोर हो गया है तो यह ठीक नहीं है। अलकायदा आज भी बेहद खतरनाक रूप से सामने आ सकता है।

अमेरिका तो आज भी अलकायदा को ही अपना दुश्मन नंबर एक मानता है।

अलकाएदा के दो महत्वपूर्ण संगठन जो एक माली में है जिसका नाम जेएनआईएम और दूसरा संगठन सोमालिया में काम करता है जिसका नाम है अल शबाब, जो बहुत बड़े खतरा के रूप में कभी भी सामने आ सकते हैं।

अल कायदा अपने लड़ाकों को आज भी आत्मघाती हम लोगों के लिए तैयार कर रहा है।

अलकायदा भी अमेरिका को अपना दुश्मन नंबर एक मानता है जबकि अब फ्रांस को वह अपनी दुश्मनी के मामले में दूसरे नंबर पर रखने लगा है।

इसका कारण है फ्रांस की विवादित पत्रिका अब्दो शार्ली इस पत्रिका में पैगंबर मोहम्मद साहब के विवादित कार्टून को छापा गया था।

इसके बाद से फ्रांस में कई तरह के हमले हो चुके हैं।

पिछले साल 16 अक्टूबर 2020 को एक आतंकी ने पेरिस के एक शिक्षक को सर काट दिया था।

हालांकि इस घटना की जिम्मेदारी किसी भी संगठन ने नहीं ली थी। लेकिन सभी जिहादी संगठनों ने उसकी बेहद तारीफ की थी।

इससे पहले 25 सितंबर को पाकिस्तानी मूल के लड़के जाहिद हसन महमूद ने शार्ली अब्दो के दफ्तर में घुसकर चाकू से हमला किया था। सभी संगठनों ने इसकी भूरी-भूरी प्रशंसा की थी।

फिर से प्रभावित करना चाहता है इस्लामिक स्टेट

पिछले साल फ्रांस की पत्रिका ने मोहम्मद साहब का विवादित कार्टून छापा था। उसका आम मुसलमानों में बेहद गुस्सा था।

इस गुस्से को बनाने में अलकायदा और इस्लामिक स्टेट दोनों ही भुनाने में लगे रहे।

लेकिन इस्लामिक स्टेट से कई कदम आगे निकल कर अल कायदा ज्यादा सक्रिय हो गया।

इस्लामिक स्टेट अफ्रीका मध्य पूर्व दक्षिण एशिया और अन्य पश्चिमी इलाकों में अपना प्रभुत्व स्थापित करने को संघर्ष कर रहा है।

अब क्या होगा ?

अमेरिका के जाने के बाद अफगानिस्तान में तालिबान फिर से सत्ता पद स्थापित हो गया है।

सभी जिहादी संगठन इसका जश्न मना रहे हैं लेकिन जब से तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों और अन्य देशों को यह भरोसा दिलाया है।

कि वह अपनी जमीन से किसी कट्टरपंथी संगठन को कोई कार्यवाही नहीं करने देगा। और अपने यहां के अल्पसंख्यकों को भी बराबरी का हक देगा।

इस सबसे अन्य जेहादी संगठन तालिबान से नाराज दिख रहे हैं। साल 2020 में अमेरिका के साथ तालिबान ने कतर में एक समझौता किया था।

जिसके तहत उसने अमेरिका और पश्चिमी देशों को यह भरोसा दिलाया था कि अपने देश से तालिबान कभी किसी कट्टरपंथी संगठन को मदद नहीं देगा।

इसी दिशा में कदम उठाते हुए तालिबान ने अपने टि्वटर अकाउंट के जरिए दुनिया के तमाम इस्लामी धर्मगुरुओं और राष्ट्र अध्यक्षों के शुभकामना संदेश प्रकाशित किये थे परंतु अलकायदा के कट्टर धार्मिक संदेशों को प्रकाशित नहीं किया।

तालिबान यह बात भली-भांति जानता है यदि अलकायदा को अपने यहां पनाह देगा तो उसका भविष्य एक बार फिर खतरे में पड़ जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *