कहानी एक कोठे वाली और उसके प्रेम की और उसकी कोठे से आजादी की

मेरी पहली मुलाकात उससे कोठे पर हुई थी। वह पहले कभी-कभार ही कोठे पर आता था।

पहले उसका कुछ भी निश्चित नहीं था। वह पहले कभी मेरे पास तो कभी दूसरी लड़कियों के पास बैठ जाता था।

परन्तु धीरे-धीरे वह सभी लड़कियों को छोड़कर मेरे पास ही बैठने लगा। हम दोनों के बीच एक अजीब सा रिश्ता बन गया।

वैसे तो किसी भी कोठे वाली के जीवन में प्यार नाम की कोई चीज होती ही नहीं है। लेकिन अनीता धीरे-धीरे उसके प्यार के बंधन में बंधी चली जा रही थी।

इससे पहले भी एक बार अनीता जिल्लत भरी जिंदगी से गुजर चुकी थी। लेकिन फिर उसे एक उम्मीद की किरण दिखाई दे रही थी।

उसकी इसी उम्मीद की किरण और उसके प्यार ने अनीता की जिल्लत भरी जिंदगी से मुक्ति दिलाई। उसने समाज में एक सम्मान जना जीवन दिया।

नौकरी का दिलासा देकर धकेला गया इस नर्क में

अनीता पश्चिम बंगाल की रहने वाली है । वह 24 परगना में उसका घर है। अनीता से बात की गई तो उसने बताया कि उसके परिवार में मां-बाप के अलावा उसकी छोटी बहन और भाई हैं।

परिवार आर्थिक तंगी के दौर से गुजरता रहता है। मेरे पापा मजदूर थे और वे अकेले पूरे परिवार का पालन पोषण नहीं कर पा रहे थे।

ऐसे में मुझे आगे आकर उनका साथ देने की जरूरत थी। इसीलिए मैंने भी नौकरी करने की सोची।

एक दिन गांव के ही एक आदमी ने मेरे पिताजी को शहर में अच्छी नौकरी दिलाने का झांसा दे दिया। सब लोग राजी खुशी तैयार हो गए मैं उसके साथ चुपचाप चली आई।

धमकी और मारपीट

शहर आकर अनीता की जिंदगी एकदम से पलट गई। काम दिलाने के बहाने से लाएगी अनीता को यहां लाकर उस व्यक्ति ने बेच दिया। अनीता को धंधे पर बिठा दिया गया।

शुरुआत में अनीता को यह सब बहुत बुरा लगा। वह यहां पर खुद को सहज महसूस नहीं कर पा रही थी।

सभी के हाथ पांव जोड़ रही थी मिन्नतें कर रही थी लेकिन किसी का हृदय नहीं पसीजा। अनीता को ऐसा लग रहा था जैसे उसे फांसी के फंदे पर लटका दिया गया है।

शुरुआत में विरोध के बाद अनीता खुद को उनके सामने मजबूत नहीं दिखा पाई और 1 दिन टूट गई।

उसने इसी को अपनी जिंदगी मान लिया। अनीता ग्राहकों के लिए तैयार हो सके इसीलिए उसके साथ जबरदस्ती की गई।

अब अनीता के पास दो ही रास्ते थे अब तो मर जाए या फिर उनका रास्ते पर चलने लगे।

अनीता कहती है कि मेरे पास इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं मर सकूं इसलिए उनके धंधे को हां कह दिया।

मुझे इस नर्क से निकलना था

मैं मछली के जैसी तड़प रही थी। मुझे कैसे भी करके इस नर्क से छुटकारा पाना था। अचानक मनीष के रूप में मुझे उम्मीद की एक किरण दिखाई थी।

न जाने कैसे मेरा और मनीष के बीच एक खास रिश्ता बन गया। न जाने क्यों मुझे मन ही मन अच्छा लगने लगा।

मनीष को मैं भी अच्छी लगने लगी। एक दिन मनीष ने अपने दिल की बात मुझसे कही।

मैंने खुशी-खुशी उसकी हां को हां में बदल दी। मुझे भी नर्क से छुटकारा पाना था और मनीष भी तो मुझे सहारा दे रहा है।

मनीष पर भी इतनी आसानी से अनीता भरोसा नहीं कर पा रही थी क्योंकि पहले भी एक बार धोखा खा चुकी है। अनीता ने मनीष से कहा कि मुझे यहां से निकालने में मेरी मदद कर करो।

इसीलिए कोठे के लोगों को शक ना हो वे दोनों सावधानी बरत रहे थे।

स्टाम्प पेपर पर लगाया अंगूठा

मनीष अनीता को इस नर्क निकालने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहा था। इसी क्रम में उसने मेरठ में काम करने वाली एक एनजीओ से संपर्क किया।

यह एनजीओ लड़कियों को कोठे से निकालने और उन्हें पुनर्वास में सहायता प्रदान करती है।

कोठे पर जाने वाले ग्राहक ही इस संस्था के मुखबिर होते हैं। इस एनजीओ को अतुल शर्मा संचालित करते हैं।

अतुल शर्मा बताते हैं कि मनीष जब पहली बार मेरे पास आया और उसने बताया कि वह कोठे की एक लड़की से बेहद प्रेम करता है और उसे अपने साथ रखना चाहता है।

अतुल शुरुआत में तो मनीष पर भरोसा नहीं कर पाए और उससे कुछ दिन बाद आने के लिए कहा। दो दिन ही बीते थे कि मनीष फिर अतुल शर्मा के पास आ गया।

अतुल को अब मनीष पर यकीन हो गया और उन्होंने अनीता को कोठे से बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी।

जब अनीता को कोठे से निकालने गये।

अतुल शर्मा और उनकी टीम पुलिस के पास पहुंची और पुलिस की मदद मांगी।

पुलिस महिला दरोगा को अपने साथ लेकर कोठे पर पहुंची। महिला दरोगा ने अनीता का नाम लेकर पुकारा।

एक लड़की एकदम उठ कर खड़ी हो गई। महिला दरोगा की समझ में आ चुका था यह वही लड़की है जिसको हम लेने आए हैं।

महिला दरोगा ने उस लड़की का हाथ पकड़ा और उस अपने साथ ले जाने लगी। अनीता थोड़ा डरी हुई थी क्योंकि उसे दलालों ने बेहद डरा रखा था।

कोठा चलाने वाली मालकिन उस लड़की को ले जाने से रोकने लगी तब महिला दरोगा ने कहा कि अगर यह लड़की सीढ़ियां खुद उतरती है तो यह हमारी हुई अन्यथा हम चुपचाप चले जाएंगे।

अनीता भागकर सीढ़ियां पार कर की और भागक गाड़ी में जाकर बैठ गई।

लड़की को वहां से निकालकर अतुल शर्मा अपनी संस्था ले आए। वहां आकर मनीष के माता-पिता से फोन पर बात की।

जैसा कि हर मां बाप का प्रक्रिया होती वैसे ही मनीष के माता-पिता भी इस शादी को तैयार नहीं हुए। लेकिन मनीष की जिद के आगे उन्हें आखिरकार झुकना पड़ा।

लेकिन उन्होंने कहा कि आप किसी भी तरह इस लड़की का अतीत किसी और के सामने पेश नहीं करेंगे। अतुल शर्मा ने इसके लिए हामी भर दी।

अनीता आगे बताती हैं कि एक जमाना था कि जब मैंने उस नर्क को ही अपना जीवन मान लिया था।

लेकिन मनीष ने मुझे वह सब कुछ दिया जिसे मैं अपने मन ही मन मार चुकी थी।

शुरुआत में जब मनीष के माता-पिता ने मुझे नहीं अपनाया तो मुझे बुरा नहीं लगता था क्योंकि मैं भी यह जानती थी यदि मैं उनकी जगह होती तब मैं भी ऐसा ही करती।

लेकिन धीरे-धीरे मैंने अपने अच्छे व्यवहार से उन सबका दिल जीत लिया। आज हम दोनों की एक बेटी है और हम इज्जत भरी जिंदगी जी रहे हैं।

आज हमने जिस जगह की कहानी सुनाई है यह जगह है मेरठ का कबाड़ी बाजार रेड लाइट एरिया यहां पर लड़कियां सीटियां मार का कस्टमर को अपनी ओर लुभाती हैं।

ऐसी लड़कियों को सामान्य जीवन का कोई विशेष अनुभव नहीं होता है, इन्हें दूर से ही कोई भी आदमी पहचान लेगा।

इसीलिए अतुल शर्मा ने अपनी संस्था में खुद के वॉलिंटियर्स को रखा है। ताकि ऐसी लड़कियों को सामान्य जीवन जीने का प्रशिक्षण दे सकें।

जब लड़कियां लंबे समय तक कोठे जैसा जीवन जीती हैं तब उनका उठना बैठना बोलना चलना सब कुछ अजीब सा हो जाता है।

इसीलिए हम प्रयास करते हैं कि उनको इस तरह प्रशिक्षित किया जाए कि वे सामान्य महिला ही लगें।

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