भारत दुनिया की 50% हींग की खपत करता है फिर भी यहां हींग की खेती क्यों नहीं की जाती

अन्य मसालों की तरह हींग भी भारतीय रसोई का हिस्सा है। यह बहुत थोड़ी मात्रा में सब्जी में मिलाया जाता है और सब्जी का स्वाद बदल देता है।

हींग न केवल खाने में स्वाद लाती है बल्कि इसके अन्य फायदे भी हैं। जैसे यह पाचन तंत्र के लिए बहुत लाभदायक है।

आप हींग को पसंद नहीं कर सकते हैं लेकिन इसकी खूबियों को नजरअंदाज नहीं कर सकते। भारत के लगभग हर घर में हींग का इस्तेमाल किया जाता है।

बावजूद इसके भारत के किसी भी क्षेत्र में हींग का उत्पादन नहीं किया जाता है।

आपके मन में यह सवाल जरूर रहा होगा कि आखिर ऐसी कौन सी वजह है कि विज्ञान के युग में भी भारत हींग जैसी चीज के लिए अन्य देशों पर निर्भर है।

हमने आज इस आर्टिकल के माध्यम से हींग की चर्चा करेंगे इसीलिए कि हमारे देश में इस बार पहली बार हींग की खेती की शुरुआत हुई है।

आइए हींग का इतिहास जानते हैं

भारत में हींग कहां से और कैसे आई इस बात का स्पष्ट प्रमाण कहीं से नहीं मिलता। कुछ लोग कहते हैं कि मुगल काल के दौरान भारत आई।

इसके पीछे उनका तर्क यह है कि ईरान से कुछ जनजातियां भारत आईं और वे अपने साथ हींग भी लेकर आईं।

जनजातियों से होते हुए भारतीय जनमानस का हिस्सा बन गई। आयुर्वेद की चरक संहिता में भी हींग का उल्लेख है।

इस किसी बात को आधार बनाकर कुछ लोगों का मानना है कि भारत में हींग का प्रयोग सेकड़ों वर्षों पूर्व से किया जा रहा है।

अब सच्चाई चाहे जो भी लेकिन सच्चाई यह है कि हींग के बिना भारतीय रसोई अधूरी है।

हम हैं दुनिया के सबसे बड़े हींग आयातक

भारत में हींग की कितनी मांग है, इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि हम अकेले ही दुनिया की 40 से 50% हींग साल भर में खा लेते हैं।

भारत हर साल अफगानिस्तान ईरान उज्बेकिस्तान से करीब 1200 टन कच्ची हींग का आयात करता है।

अगर हम अन्य देशों की बात करें तो ईरान और अफगानिस्तान की पहाड़ियों में सर्वाधिक मात्रा में इन मिलती है। यहां की पहाड़ियों में ही हींग का पौधा पाया जाता है।

एक अनुमान के मुताबिक भारत करीब 600 करोड़ रुपए की हींग हर साल अपने यहां मंगाता है।

भारत में हींग की खेती क्यों नहीं हो पाई

एक प्रसिद्ध अखबार में छपी खबर के अनुसार 1963 से 1989 के मध्य भारत में हींग की खेती करने को प्रयास किया जा चुका है। लेकिन इस बात की कोई पुख्ता जानकारी नहीं है।

2017 में भी इनकी बढ़ती मांग को देखते हुए अपने यहां हींग की खेती करने की मांग की थी।

इस बात को लेकर बकायदा एक प्रस्ताव किया गया था और ईरान से बीज मंगाया गया था। ईरान से आए इन बीजों को भारतीय शोध परिषद यानी ICAR ने मंजूरी दी।

मंजूरी मिलने के बाद यह वह बीज बोया गया था लेकिन आगे की रिसर्च से यह बात सामने आई ।

हींग के पौधे के अंकुरण दर केवल एक ही प्रतिशत है। मतलब साफ है कि यदि हम 100 बीजों को एक बार में बोएं तो मात्र एक ही पौधा उग रहा है।

यह एक बड़ी चुनौती है। हमारे विशेषज्ञ इसका विकल्प ढूंढने के लिए लगातार प्रयासरत है।

आईसीएमआर के विशेषज्ञ बताते हैं कि हींग के पौधे को अंकुरित होने के लिए उसके अनुकूल वातावरण चाहिए होता।

हींग एक प्राकृतिक जड़ी बूटी है। यह हींग ज्यादातर हिमालय के हिस्से में उगाई जा सकती है।

भारतीय वैज्ञानिक इस बात को लेकर प्रयासरत हैं कि से कृत्रिम तरीके से इसे उगाया जा सके।

इन्हीं प्रयासों को मद्देनजर रखते हुए सीएसआइआर और आईएसबीटी पालमपुर ने देश में पहली बार हींग की खेती करने प्रयास शुरू किया है।

संजय कुमार जोकि आईएचबीटी पालमपुर के डायरेक्टर हैं, उन्होंने बताया कि लाहौल और स्पीति के गांव कवरिंग में उन्होंने हींग की खेती होने का प्रयास शुरू किया है।

यह क्षेत्र हिमाचल प्रदेश का एक ठंडा और सूखा क्षेत्र है। यहां पर हमें असीम संभावनाएं हैं।

यदि यहां पर हींग की खेती हो जाती है तो विदेश से आने वाली हींग के आयात में निश्चित तौर पर कमी आएगी।

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