पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री को फांसी देने बाद उनके प्राइवेट पार्ट की फोटो क्यों खिंचवाई गई ?

जुल्फिकार अली भुट्टो जोकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे थे। उनका जन्म 5 जनवरी 1928 को हुआ था। जुल्फिकार के पिता का नाम शाहनवाज भुट्टो था।

जुल्फिकार अली भुट्टो का नाम मुसलमानों के चौथे खलीफा हजरत अली की तलवार के नाम पर रखा गया था। सभी लोग प्यार से जुल्फिकार को जुल्फी कहकर पुकारते थे।

साल 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद जुल्फिकार अली भुट्टो के पिता शाहनवाज भुट्टो जूनागढ़ के राजा मोहब्बत रसूल के यहां दीवान की नौकरी करने लगे।

इसी साल जुल्फिकार भी मुंबई से अमेरिका चले गए। वहां पर 10 साल अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे पाकिस्तान चली गए।

वे पाकिस्तान तो चले गए लेकिन उन्होंने न तो अब तक पाकिस्तान की नागरिकता ग्रहण की थी और ना ही भारत की नागरिकता छोड़ी थी।

बावजूद इसके साल 1957 में इस्कंदर मिर्जा ने जुल्फिकार को अपनी कैबिनेट का हिस्सा बनाया।

कैबिनेट का हिस्सा बनने के कुछ दिन बाद तक जुल्फिकार ने भारत की नागरिकता नहीं त्यागी थी।

एक बार कैबिनेट में जगह बनाने के बाद जुल्फीकार राजनीति में आगे बढ़ते गए और एक दिन राजनीति के शिखर तक पहुंच गए। यानी वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए।

अपने सरकार के शुरुआती दिनों में उनकी सरकार को आवाम की सरकार बुलाया जाता था। उनके कैबिनेट को आम जनता कायदे आवाम कह कर पुकारते थे।

उनकी सरकार का एकमात्र नारा था रोटी कपड़ा और मकान और उनकी सरकार की इस्लामिक समाजवाद की पॉलिसी थी।

जुल्फिकार की सरकार अपने शुरुआती दिनों में पाकिस्तान की खेती पर बहुत ज्यादा ध्यान दे रही थी।

सरकार किसानों की खेती की दिशा में कार्य कर रही थी। असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों के अधिकारों में भी वृद्धि कर रही थी।

सामंती परिवार से होने के बावजूद जुल्फिकार अली भुट्टो ने यह घोषणा की की वे जमीदारों से जमीन छीन कर गरीबों में उसका वितरण करेंगे।

अपने ऐसे ही फैसलों की वजह से जुल्फिकार अली भुट्टो आम जनता में बहुत लोकप्रिय हो गए थे।

14 अगस्त 1973 को जुल्फिकार अली भुट्टो ने पाकिस्तान के लिए नए संविधान का निर्माण किया यही संविधान आज तक पाकिस्तान में लागू है हालांकि समय-समय पर परिवर्तन होते रहते हैं।

जुल्फिकार अली भुट्टो की कहानी भी कहीं ना कहीं जुलियस सीजर से मिलती जुलती है।

जिस प्रकार जुल्फिकार अली भुट्टो ने आम जनता के बीच अपनी जगह बनाई थी। उसी तरह जुलियस सीजर ने भी आम जनता के बीच अपनी प्रसिद्धि हासिल की थी।

सीजर की शक्तियों से घबराकर उसके राज्य के कुछ ताकतवर लोगों ने सीजर की जान ले ली थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ भी ऐसा ही हुआ था।

जुल्फिकार अली को अपने सत्ता पर घमंड आने लगा था और और उनमें धीरे धीरे तानाशाही जन्म ले रही थी।

विरोधियों की बात को नहीं सुनते थे और यदि कोई उनकी किसी भी फैसले का विरोध करता था तो वह पूरी ताकत से उसे दडा दिया करते थे। यदि किसी ने उनकी आलोचना की थी उसकी भी दुश्मनी निकाला करते थे।

जुल्फिकार अली के इसी रवैए से परेशान होकर विरोधी पार्टियों ने एक गठबंधन बना लिया।

शुरुआत में तो बस 9 पार्टियां ही खत्म हुई थी लेकिन बाद में और पार्टियां भी उसमें शामिल हो गईं।

इन सभी पार्टियों ने पाकिस्तान नेशनल अलायंस यानी PNA का गठन किया। पाकिस्तान में 7 मार्च 1977 को आम चुनाव संपन्न हुए।

जब इन चुनावों के नतीजे आए तो भूट्टो की पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को 155 सीटें मिली जबकि पीएम ने गठबंधन को मात्र 36 सीटें ही हाथ लगीं।

इस चुनाव नतीजों को विरोधियों ने खारिज कर दिया और इस प्रकार जुल्फिकार अली पर चुनाव में धांधली करने का आरोप लगाया।

विरोधियों ने जुल्फिकार अली के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने शुरू कर दिए।

जुल्फिकार ने तमाम प्रयास किए कि किसी तरह इस विरोध को दबा दिया जाए लेकिन वे सफल नहीं हुए। जुल्फिकार अली भुट्टो ने खुद को इस्लामिक दर्शाने की भरपूर कोशिश की।

उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण फैसले लिए जिनमें शराब पर बैन लगा लगाना नाइट क्लब प्रतिबंधित कर दिए और साप्ताहिक अवकाश रविवार की जगह शुक्रवार को घोषित किया गया।

लेकिन इसका कोई प्रभाव आम जनता पर नहीं पड़ा। भुट्टो के खिलाफ विरोध बढ़ता ही जा रहा था।

धीरे-धीरे विरोध ने हिंसक रूप धारण कर लिया। जुल्फिकार अली भुट्टो ने इस विद्रोह को दबाने के लिए एक और शतरंज की चाल चली।

उन्होंने आम जनता को बताया कि अफगानिस्तान, ईरान और भारत तीनों मिलकर पाकिस्तान पर हमले की योजना बना रहे हैं।

लेकिन भुट्टो की एक तरकीब भी उनके काम नहीं आई। फिर अचानक 4 और 5 जुलाई 1977 को जिस जिया उल हक को जुल्फिकार अली भुट्टो ने आर्मी चीज बनाया था,

उसी ने भुट्टो का तख्ता पलट कर दिया। उसने न केवल भुट्टो की गद्दी छीनी बल्कि भुट्टो को जेल में भी डाल दिया।

 

18 मार्च 1978 से 4 अप्रैल 1979 तक

जुल्फिकार अली भुट्टो को जेल में डालने के बाद उन पर अहमद रजा कसूरी को जान से मारने के प्रयास का और अहमद रजा कसूरी के पिता की जान लेने का दोषी पाया गया। उनको 18 मार्च 1978 को मृत्युदंड की सजा दी गई।

अहमद रजा कसूरी बहुत प्रसिद्ध और आदर्शवादी नेता थे। वे शुरुआत में तो भुट्टो के साथ थे लेकिन बाद में उनका भुट्टो से अलग हो गए।

एक बार अहमद रजा ने ही कहा था कि भुट्टो ही उनकी जान लेना चाहते थे और वे 15 बार इसका प्रयास कर चुके थे।

हालांकि तमाम विदेशी पत्रकार और पाकिस्तानी इतिहासकार का मानना है कि यह केस पूरी तरह झूठा था। जुल्फिकार अली भुट्टो ने ऐसा कुछ भी नहीं किया था।

जुल्फिकार अली भुट्टो को पूरा भरोसा था कि उनको फांसी की सजा का ऐलान किया जा सकता है लेकिन उनको फांसी नहीं दी जा सकती।

वह अपनी फांसी लगने की समय तक यही उम्मीद लगाए रहे लेकिन 4 अप्रैल 1979 को रात 2:00 बजे उन्हें फांसी पर लटका दिया गया।

सुफैला जाफरी ने बीबीसी के लिए एक आर्टिकल लिखा जिसके अनुसार जब गार्ड आए तब जुल्फिकार अली गहरी नींद में सो रहे थे।

जब उनसे उठने और फांसी के लिए चलने को कहा गया तो वे उठ नहीं पाए थे उन्हें स्ट्रेचर पर रख कर लाया गया था। गार्ड के साथ जेल के सुपरिंटेंडेंट भी थे।

उन्होंने जुल्फिकार से दोबारा कहा कि आपको अब उठ जाना चाहिए तब जुल्फिकार ने हल्का सा सर उठाया और वह दोबारा सो गए।

जब उन्हें फांसी के तख्त तक लाया गया तो मुझे सुपरिंटेंडेंट ने उनसे कहा कि लोग आपको देख रहे हैं।

आप उनका सामना कीजिए यह सुनकर उनके मन में थोड़ी हिम्मत आई और उठकर खड़े हुए इस बार भी बिना सहारे के ही खड़े हुए थे।

फांसी के कुछ समय बाद जुल्फिकार के शव को उनके गांव ले जाया गया और उन्हें उनकी पैत्रक जमीन पर दफन कर दिया गया।

जब उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा था तब उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो और उनकी पत्नी नुसरत भुट्टो को वहां जाने की अनुमति नहीं दी गई।

कुछ सालों बाद जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी बेनजीर भुट्टो भी पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं और वह भी अपने पिता की तरह ही अपने विरोधियों की भेंट चढ़ गुईं।

जुल्फिकार अली भुट्टो पर सच्चा मुसलमान ना होने का आरोप था। उनकी मां शादी से पहले एक हिंदू महिला थीं, जिन्होंने बाद में इस्लाम स्वीकार किया था।

उनकी मां नाचने गाने वाली थीं। जुल्फिकार के विरोधी कहते थे कि जुल्फिकार अली भुट्टो इस्लामी तहजीब के नहीं है।

विरोधियों का कहना था कि हमें तो इस बात पर भी संदेह है कि वह सच्चे मुसलमान है भी या नहीं।

जब खींची गई उनके प्राइवेट पार्ट की फोटो

कर्नल रफीउद्दीन ने जुल्फिकार अली भुट्टो पर एक किताब लिखी थी जिसका नाम था भुट्टो के आखिरी 323 दिन। इस किताब को लिखने वाले कर्नल रफीउद्दीन उस वक्त वहां की जेल की सिक्योरिटी इंचार्ज थे।

जुल्फिकार पर लिखी अपनी इस किताब में उन्होंने लिखा है कि जब भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया तो खुफिया एजेंसियों ने एक फोटोग्राफर को वहां भेजा और वहां भुट्टो की तस्वीर लेने का आदेश दिया।

और उस फोटोग्राफर को निर्देश देकर भेजा गया था कि वो जुल्फिकार अली भुट्टो के प्राइवेट पार्ट की फोटो खींचकर लाए।

खुफिया ऐजेन्सी यह जानना चाहते थीं कि जुल्फिकार अली भुट्टो एक सच्चे मुसलमान थे या नहीं।

उनके प्राइवेट पार्ट को देखने के उनको पता चला कि जुल्फिकार अली भुट्टो एक सच्चे मुसलमान थे।

साभार :- The Lallontop

 

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