परमाणू पनडुब्बी सबसे ताकतवर पनडुब्बी क्यों है ? आस्ट्रेलिया ने इसे लेकर फ्रांस से समझौता क्यों तोड़ा ?

विश्व स्तर पर चीन का प्रभाव घटाने के उद्देश्य से अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने नया गठबंधन बनाने की घोषणा की है। गठबंधन को AUKUS के नाम से जाना जाएगा।

इसका नाम पर इन तीनों देशों के पहले अक्षर से है इस संगठन के नाम का ऐलान हुआ है। A से ऑस्ट्रेलिया UK से UNITED KINGDOM और US यूनाइटेड स्टेट।

इस गठबंधन को बनाने का कारण हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में अपने-अपने हितों की हिफाजत करना है। इन देशों के बीच समझौता हुआ है।

उसके अनुसार अमेरिका ऑस्ट्रेलिया को परमाणु शक्ति से सम्पन्न करेगा। अमेरिका परमाणु पनडुब्बियों की तकनीक आस्ट्रेलिया को देगा।

अमेरिका ने अभी तक केवल ब्रिटेन के साथ ही यह समझौता किया था। लेकिन अमेरिका ऑस्ट्रेलिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहता है।

आइए जानते हैं कि पूरी दुनिया में परमाणु पनडुब्बी के लिए पागल क्यों है ?

परमाणु पनडुब्बी किसे कहते हैं ?

जब परमाणु के बारे में वैज्ञानिकों को पता चला तो वैज्ञानिकों ने इस बात पर भी ध्यान दिया है कि हम चाहे तो इस परमाणु से बम बनाने के अलावा ऊर्जा जरूरतों को भी पूरा कर सकते हैं।

यही कारण है कि यह परमाणु रिएक्टर करीब 70 सालों से हमारे घरों की बिजली सप्लाई दे रहा है।

परमाणु पनडुब्बी में भी इसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। हर एक परमाणु पनडुब्बी में एक छोटा सा परमाणु रिएक्टर होता है।

इसका प्रयोग बिजली उत्पादन के लिए किया है। इसी परमाणु रिएक्टर की मदद से पनडुब्बी में बिजली की पूरी सप्लाई दी जाती है।

परमाणु रिएक्टर की मदद से ही पनडुब्बी महीनों तक चुपचाप समंदर के अंदर छुपी रह सकती है।

परमाणु पनडुब्बी और डीजल पनडुब्बी में अंतर क्या है ?

डीजल पनडुब्बी को पारंपरिक पनडुब्बी के नाम से भी जाना जाता है। डीजल पनडुब्बी को एक अन्य नाम इलेक्ट्रिक पनडुब्बी भी कहा जाता है।

पनडुब्बी की बैटरी चार्ज करने के लिए इसमें डीजल जनरेटर का प्रयोग किया जाता है।

और जब बैटरी चार्ज हो जाती है तो स्टोर की हुई ऊर्जा से ही पनडुब्बी की पावर सप्लाई की जाती है।

परंतु इस पनडुब्बी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसकी बैटरी चार्ज करने के लिए एनार्कुलम प्रक्रिया को कंप्लीट करने के लिए पनडुब्बियों को समुद्र की ऊपर यानी सतह पर आना होता है।

इस प्रक्रिया के द्वारा डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों जनरेटर में उपयोग की जाने वाली ऑक्सीजन का संग्रह करते हैं।

यही पनडुब्बी के लिए सबसे खतरनाक बात होती है क्योंकि जब पनडुब्बी समुद्री सतह पर आ जाती है तो दुश्मनों को उसे खोज पाना आसान हो जाता है।

परमाणु पनडुब्बी ताकतवर ज्यादा होती है

वैज्ञानिकों का कहना है कि परंपरागत यानी इलेक्ट्रॉनिक पनडुब्बी से परमाणु पनडुब्बी कहीं ज्यादा ताकतवर होती है। परमाणु पनडुब्बी चुपचाप सैकडों मीटर पानी में नीचे छुपकर रह सकती है।

समुंदर के नीचे पानी का दबाव बहुत ज्यादा होता है इस सब के बावजूद परमाणु पनडुब्बी 60 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ सकती है।

यही कारण है कि दुश्मन इस पनडुब्बी को पकड़ नहीं पाता।

इलेक्ट्रिक पनडुब्बी की तुलना में परमाणु पनडुब्बी दुश्मन के काफी करीब रह सकती है और दुश्मन को इसका पता भी नहीं चलता।

परमाणु पनडुब्बी को कैसे खोजा जाए

परमाणु रिएक्टर जब काफी गर्म हो जाते हैं तब उन को ठंडा करने के लिए पानी इस्तेमाल में लाया जाता है।

और यह पानी बेहद गर्म होकर समुंदर में आता है इसीलिए किसी थर्मल इमेजर की मदद से सतह पर आता है। इस पानी को आसानी से पहचाना जा सकता है।

इस सबके अलावा परमाणु पनडुब्बी में जो सिस्टम ऑक्सीजन उत्पन्न करता है वह भी इलेक्ट्रिक पनडुब्बी के सिस्टम से ज्यादा साउंड करता है।

परमाणु पनडुब्बी का इतिहास

परमाणु पनडुब्बी बनाने की शुरुआत अगर हम करें तो यह 1939 में हुई थी जब अमेरिका के नेशनल रिसर्च लैबोरेट्री के वैज्ञानिक रोज गन के दिमाग में परमाणु पनडुब्बी बनाने का विचार आया।

उनके विचार आने के करीब एक दशक बाद यानी 1951 में अमेरिका की संसद ने इसे बनाने की मंजूरी दे दी।

साल 1954 में यूएसएस नॉटिकल 571 नाम से दुनिया की पहली परमाणु पनडुब्बी अस्तित्व में आई।

AUKUS के कारण ही आस्ट्रेलिया ने फ्रांस से करार तोड़ा

कुछ समय पहले अमेरिका और फ्रांस के बीच 43 अरब डॉलर का समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत फ्रांस ऑस्ट्रेलिया को परमाणु पनडुब्बियों करार के तौर पर देता।

लेकिन जब से ऑस्ट्रेलिया AUKUS का सदस्य बना। वैसे ही उसने फ्रांस के साथ 40 अरब डाॅलर का समझौता तोड़ दिया।

जबकि साल 2019 में जब इन दोनों देशों के बीच परमाणु पनडुब्बियों के लिए का जब यह समझौता हुआ था।

तब ऑस्ट्रेलिया ने इसे सदी का सबसे बड़ा समझौता कहकर संबोधित किया था।

यह समझौता तोड़ने के बाद फ्रांस सरकार ने ऑस्ट्रेलिया की तीखी आलोचना की है। इस समझौते को तोड़ने वाले ऑस्ट्रेलिया को धोखेबाज बताया है।

” जो बाइडन भी डोनाल्ड ट्रम्प की तरह ही हैं ” फ्रांस सरकार

फ्रांस सरकार ने कहा है कि जो वाइडन भी डोनाल्ड ट्रम्प की तरह ही निकले। अमेरिका का व्यवहार हमें बहुत ज्यादा चिंतित करता है।

यह भी डोनाल्ड ट्रम्प की तरह ही व्यवहारिक नहीं है। यह बहुत ही चिंतित करने वाला है।

 

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