उस दिन क्या हुआ जब राष्ट्रपति गनी अपना देश छोड़कर भागे थे

तालिबान से सत्ता छीनने के 20 साल बाद अमेरिका ने एक बार फिर अफगानिस्तान को छोड़ दिया। तालिबान ने यहां कब्जा करके लोकतांत्रिक सरकार के गठन की घोषणा की।

लेकिन यह बात थोड़ी सी अजीब सी लगती है कि 20 साल तक जिस देश की सेना को अमेरिका जैसे देश ने ट्रेंड किया हो वह सरकार इतनी जल्दी धराशाई कैसे हो गई।

तालेबान के अफगानिस्तान पर कब्जा करने से पहले तमाम विशेषज्ञ इस बात की आशंका व्यक्त कर रहे थे कि तालिबान तब तक काबुल पर अपना नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकता जब तक कि अशरफ गनी सरकार से वह कोई बातचीत न कर ले।

लेकिन तालिबान को पूरे देश पर कब्जा करने में मात्र 10 दिन का समय लगा।

तालिबान के लड़ाके जैसे ही काबुल की सीमा पर पहुंचे तो कुछ ही घंटे में अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ गनी और उनके साथी अपना देश छोड़कर भाग गए।

अफगानिस्तान की सेना के उच्च पदों पर आसीन पुलिस अधिकारियों ने तालिबान के लड़ाकों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और चुपचाप वहां से गायब हो गए।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि 20 साल तक अमेरिका से ट्रेनिंग लेने के बाद भी अफगानिस्तान के सैनिक तालिबान के चंद लड़ाकों के सामने ताश के पत्तों की तरह कैसे बिखर गए।

बीबीसी हिंदी में छपी खबर के अनुसार 14 अगस्त दिन शनिवार को राष्ट्रपति अशरफ गनी तालिबान के रवैए को लेकर चिंतित जरूर लग रहे थे लेकिन उनके चेहरे पर डर के नामोनिशान नहीं था। काबुल को पूरी तरह चाक चौबंद करने की योजना बनाई जा रही थी।

इस बैठक मे अफगानिस्तान में शीर्ष अमेरिकी सैन्य अधिकारी अफगानिस्तान की सेना अध्यक्ष के बीच वार्ता चल रही थी।

इस वार्ता का उद्देश्य तालिबान को बातचीत के उद्देश्य से काबुल शहर के बाहर ही रोकना था।

उस समय अफगानिस्तान के सबसे बड़े प्रांत हेलमंद के कमांडर सामी सादात को काबुल की नई सुरक्षा टीम का मुख्य बना दिया गया।

यदि आवश्यकता हो तो तालिबान के साथ युद्ध भी किया जाएगा लेकिन उनकी कोशिश यह थी तालिबान को शांतिपूर्ण बातचीत की मेज पर लाया जाए। सामी सादात ने अभी तक अपना पद नहीं छोड़ा था।

उसी समय तालिबान उत्तरी क्षेत्र के सबसे बड़े शहर मजार-ए- शरीफ पर कब्जा कर चुके थे।

इस क्षेत्र पर कब्जा करने के बाद भी अगले शहर जलालाबाद पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश करने लगे।

हालांकि बहुत कम प्रतिरोध के बाद तालिबान ने इन दोनों शहरों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था।

अशरफ गनी आईएमएफ के पूर्व अधिकारी रह चुके हैं और उन्होंने साल 2014 में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति की कुर्सी संभाली।

राष्ट्रपति अशरफ गनी के आलोचक उन पर हमला करते हुए कहते हैं कि जब वे अपने कार्यकाल के अंतिम हफ्ते में थे तालिबान के खतरे को ठीक से नहीं आंक पाए।

तालिबान के खिलाफ कोई भी कदम उठाने से पहले वे अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्लाह के साथ जो कुछ भी हुआ वह जरूर सोच लेते होंगे। शायद यही वजह रही कि वे तालिबान पर कोई भी कड़ा फैसला नहीं ले पाए।

हुआ यह था कि 1998 में जब तालिबान ने काबुल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। तो उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति नजीबुल्लाह को गिरफ्तार कर लिया था।

हालांकि यह बात भी ठीक है नजीबुल्लाह साल 1992 में ही अपने पद से इस्तीफा दे चुके थे।

लेकिन काबुल पर तालिबान के नियंत्रण के बाद भी अपने देश को छोड़कर भाग नहीं पाए।

यही कारण था कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की स्थापित इमारत में अपनी जान बचाई।

लेकिन 1996 में नजीबुल्लाह को मारने के उद्देश्य से तालिबान के लड़ाके संयुक्त राष्ट्र की उस बिल्डिंग में घुस गए जहां राष्ट्रपति नजीबुल्लाह अपने प्राण बचाने के लिए छिपे हुए थे। और वहीं पर परिसर में ही उनकी जान ले ली थी

उनकी जान लेने के बाद राष्ट्रपति नजीबुल्लाह के शव को तालिबानियों ने शहर की एक सिग्नल लाइट पर लटका दिया उनका यह हश्र देखकर इस समय के राष्ट्रपति अशरफ गनी सिहर जाते होंगे।

15 अगस्त , दिन रविवार

15 अगस्त दिन रविवार अफगानिस्तान के लिए सामान्य दिन नहीं था। दिन निकलने के साथ-साथ काबुल में तमाम तरह की अफवाहें जन्म ले रही थीं। लोगों में अजीब सी बेचैनी होने लगी थी।

लोग अपने घर में पैसा इकट्ठा करने की जुगत में लगे थे। इसके लिए बैंकों के सामने लंबी-लंबी कतारें लगी हुई थीं।

हालांकि अशरफ गनी और उनके लड़ाके अभी भी इस उम्मीद में थे कि काबुल पर इतनी जल्दी नियंत्रण स्थापित नहीं हो सकता।

14 अगस्त को जो तालिबान के लड़ाकों से बातचीत हुई थी उससे उन्हें उम्मीद थी कि इतनी जल्दी कुछ भी गलत नहीं करेगा। उन्होंने तालिबान को सरकार में शामिल होने के लिए ऑफर दिया था।

काबुल की जनता भयभीत न हों और वह अपने घर में घरों में ही कैद रहे। इसके लिए राष्ट्रपति अशरफ गनी ने उसी दिन रविवार को एक वीडियो टेप जारी किया।

जिसमें जो शहर की सुरक्षा पर चर्चा करते नजर आ रहे हैं। इस वीडियो में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति के अलावा गृहमंत्री ही नजर आए।

इस वीडियो से उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया कि तालिबान के साथ समझौता होने ही जा रहा है।

और काबुल में किसी तरह की कोई लड़ाई नहीं चलेगी।

लेकिन उनके इस वीडियो से आम जनता तो दूर उनके साथी भी बहुत ज्यादा भरोसा नहीं रख पाए।

उनके पुराने साथी उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह अपनी जन्मस्थली पंजशीर घाटी पहुंच चुके थे। इस तरह उनकी योजना विफल होती चली गई।

अशरफ गनी जहां एक और अपने देशवासियों को हिम्मत बंधा रहे थे वहीं दूसरी और अफगानिस्तान के कुछ राजनेता इस्लामाबाद जाने की जुगत में थे।

इन नेताओं में अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति करीम खलीली के साथ-साथ रहमान रेहमानी जोकि नेशनल असेंबली के अध्यक्ष भी थे, शामिल थे।

उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य पाकिस्तानी सरकार से आग्रह करना था कि वह अफगानिस्तान में हो रहे रक्तपात रोके और किसी भी तरह शांति स्थापित करें।

लेकिन सत्ता से बेदखल होने के डर से अशरफ गनी ने उनको जाने से मना कर दिया था।

अशरफ गनी को आशंका थी कि यदि जनता के बीच यह खबर फैल गई कि नेशनल असेंबली के अध्यक्ष भी देश छोड़कर भाग चुके हैं। तो देश में अराजकता फैल जाएगी।

जब प्रतिनिधिमंडल एयरपोर्ट जा रहा था तब उन्होंने शहर में हर तरफ डर और दहशत का माहौल देखा था।

शहर की जनता बड़ी उम्मीद से सरकार की तरफ देख रही थी। वह प्रतिनिधिमंडल जब एयरपोर्ट की तरफ जा रहा था तो उनका कारवां ट्रैफिक में फंस गया।

ट्रैफिक इतना भयंकर था कि उन्होंने ट्रैफिक हटने की उम्मीद छोड़ दी और एयरपोर्ट पर जाने के लिए उन्होंने 15 मिनट तक पैदल यात्रा की।

इसी बीच उन्हें तालिबान के आगे बढ़ने की खबरें लगातार मिलती रहीं। जब एयरपोर्ट पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि वहां तो अलग ही माहौल है।

कानून व्यवस्था जैसी कोई चीज ही नहीं थी। ऐसा माहौल था कि लोग एक दूसरे से लड़ रहे थे।

सुरक्षाकर्मी भी कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह भी अपनी जान बचाकर भाग रहे थे।

वीआईपी लोगों को स्पेशल ट्रीटमेंट देने के उद्देश्य से वहां पर मौजूद कुछ लोगों की टिकट भी कैंसिल किए गए।

दोपहर तक

दोपहर बाद तक राष्ट्रपति भवन की हालत बेहद गंभीर हो चुकी थी। अशरफ गनी तमाम प्रयास करने के बाद भी असफल हो रहे थे।

वह अपने गृह मंत्रालय के मुख्य अधिकारियों से संपर्क नहीं कर पा रहे थे।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि ऐसा महसूस हो रहा था कि सरकार की पूरी व्यवस्था खत्म हो गई। सभी अधिकारी एक दूसरे में विभाजित हो चुके थे।

पूरा सरकारी महकमा राष्ट्रपति भवन से किसी आशा की उम्मीद लिए बैठा था लेकिन हमें हर बार निराशा ही हाथ लग रही थी।

अशरफ गनी के आसपास सुरक्षा भी घटता जा रहा था। उनके साथ अंत में दो लोग ही रह गए थे जिनमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हमदुल्लाह मोहिब और एक अन्य फजल फाजली रह गए थे।

इनमें से हमदुल्ला मोहेब जोकि यूरोप में शिक्षा हासिल कर चुके थे, अशरफ गनी के सबसे भरोसेमंद साथी थे। हालांकि मोहिब की किसी तरह से सैन्य पृष्ठभूमि नहीं थी।

अशरफ गनी ने साल 2018 में उन्हें अपना राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया था। विश्वस्त सूत्रों ने बताया कि अशरफ गनी देश छोड़कर नहीं जाना चाहते थे।

लेकिन उनके सुरक्षा सलाहकार ने उन्हें तत्काल देश छोड़कर जाने को कहा क्योंकि यदि विदेश में रहते तो उनकी जान को खतरा हो सकता था।

सूत्रों से अशरफ गनी को जानकारी हुई कि तालिबान बहुत तेजी से राष्ट्रपति भवन की ओर बढ़ रहा है और अगर उसने राष्ट्रपति गनी को पकड़ लिया तो वह जान ले लेगा।

कई विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राष्ट्रपति की सुरक्षा में लगे गार्ड नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति अशरफ से नहीं देश छोड़कर भागें।

जब उनका परिवार देश छोड़कर जा रहा था तब अंग रक्षकों और हेलीकॉप्टर के चालक दल के बीच भारी बहस हो गई थी।

वह इतनी बढ़ गई थी कि सुरक्षा गार्डों ने उनके कुछ जमीन पर पटक दिए थे।

जब अशरफ गनी यूएई पहुंच गए तो उन्होंने अपने ऊपर लगे उन आरोपों का वेबाकी से खंडन किया, जिसमें बताया गया था कि यह देश छोड़कर भागने के दौरान बहुत बड़ी रकम अपने साथ ले गए थे।

सुबह करीब 3:30 बजे राष्ट्रपति गनी अपने परिवार के साथ और हमदुल्लाह मोहेब और फाजली को लेकर राष्ट्रपति भवन से निकल गए।

वहां से निकलकर वे टरमेज पहुंचे जो उज्बेकिस्ता का शहर है। वहां से संयुक्त अरब अमीरात पहुंच गए।

वह इस तरह से देश छोड़कर भाग जाएंगे इसकी उम्मीद तो तालिबान ने भी नहीं की थी।

राष्ट्रपति अशरफ घनी ने अपने भागने की खबर अपने अन्य साथियों को भी नहीं दी थी क्योंकि वह काबुल हवाई अड्डे पर अपने बॉस के आने का इंतजार कर रहे थे।

अशरफ गनी के जाने के बाद काबुल को यह महसूस होने लगा था कि अब उनका अफगानिस्तान पहले जैसा अफगानिस्तान नहीं रहा। यह हमेशा के लिए बदल चुका है।

काबुल के लिए यह अब तक की सबसे दर्द भरी रात है। काबुल के लिए उम्मीदों की सांसें अब हमेशा के लिए थम चुकी हैं।

 

साभार बीबीसी हिंदी

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