सारगढ़ी का युद्ध – जब 21 सिक्खों ने 1000 अफगानियों के दांत खट्टे कर दिए थे

 

सरदारों को हमने चुटकुले में ही समेट कर रखा है। लेकिन सच्चाई यह है कि सरदारों ने हमारे इतिहास में हमको ऐसी प्रेरणादायक कहानियां दी हैं

जो अगर हम सुन ले तो रोंगटे खड़े कर देगा। सरदारों ने अपनी मिट्टी की हिफाजत के लिए खुद को भी समर्पित कर दिया है।

सरदारों समर्पण भावना पर ही साल 2019 में अक्षय कुमार की फिल्म आई थी केसरी।

इस फिल्म में दिखाया गया है कि मात्र 21 सैनिकों ने 10 हजार अफगान सैनिकों सैनिकों के दांत खट्टे कर दिए थे।

फिल्म जो कुछ भी दिखाया गया है वह काल्पनिक नहीं है।

यह पूरी कहानी सच्ची घटना पर आधारित है। आइए जानते हैं कि यह युद्ध कहां और किसके बीच लड़ा गया था।

सारगढ़ी का युद्ध

सारागढ़ी गांव के करीब लड़ा जाने के कारण इस युद्ध को सारागढ़ी का युद्ध कहा जाता है। भारत में तब तक आजादी का बिगुल फूंक चुका था

और अंग्रेज अपनी विस्तारवादी नीति के तहत भारत के आसपास अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते थे।

अंग्रेज खेबर और उसके आसपास के क्षेत्रों को अपने राज्य में मिलाना चाहते थे। खेबर का इलाका 1897 से पहले अंग्रेजों के प्रभुत्व में ही आता था

लेकिन उसे कुछ अफगानी कबीलों ने उस कब्जा कर लिया था। अंग्रेज अपने क्षेत्र को वापस लेना चाहते थे इसीलिए अंग्रेज जब तब इस क्षेत्र पर हमला करते रहते थे।

अफगानी अंग्रेजों के इस हरकत से परेशान हो गए और उन्होंने अंग्रेजों को सबक सिखाने की ठानी। इसके लिए उन्होंने अंग्रेजों के दो किलों को अपना निशाना बनाया।

ऐसा करके अफगानी अंग्रेजों को झुकने पर मजबूत कर सकते थे। इन दोनों में से एक किले का नाम था लॉकहार्ट और दूसरे का नाम था गुलिस्तान।

लाॅकहार्ट में अंग्रेज सेना का बेस था जबकि गुलिस्तान में ब्रिटिश सेना का कम्युनिकेशन सिस्टम लगा हुआ था।

उन्होंने रणनीति बनाई कि यदि इन दोनों पर कब्जा कर लिया जाता है तो अंग्रेज उनके सामने नतमस्तक हो जाएंगे।

इसी इरादे से उन्होंने 12 सितंबर 1897 को सारगढ़ी पर हमला कर दिया।

1000 अफगानियों के सामने मात्र 21 सिख

उन्होंने जब अफगानियों ने सारगढ़ी पर हमला किया था तब वहां पर उनके हमलों को रोकने के लिए हवालदार ईशर सिंह के अलावा मात्र 20 सिपाही ही मौजूद थे।

इतनी बड़ी संख्या को देखकर हवलदार ईशर सिंह ने अपने कमांडर हाॅटन को इस बात की जानकारी दी। जवाब में हाॅटन ने कहा कि आपकी मदद के लिए थोड़ा समय लगेगा।

तब तक मदद आती है तब तक आप किसी भी तरह अफगानियीं को रोके रखें। ईशर सिंह और उनके सैनिकों के सामने करो या मरो की स्थिति थी।

यही कारण था कि उन्होंने यह तय किया कि जब तक शरीर में आखरी सांस रहेगी तब तक हम अफगानियों से युद्ध करेंगे।

युद्ध आरंभ हो गया और इस युद्ध में समय के साथ-साथ सिखों की गोला बारूद और गोलियां भी खत्म होने लगे हैं।

इस कारण दुश्मन हम पर हावी होने लगा। लेकिन सिख सैनिकों ने फिर तलवार के दम पर अफगानियों से लोहा लिया।

अफगानियों ने सिक्खों को उलझाने के लिए आसपास की झाड़ियों में आग लगा दी और किले की दीवार तोड़कर अंदर घुस गए।

गोलियां खत्म हो जाने के कारण सरदारों ने तलवार से लड़ना शुरू कर दिया। 3 घंटे चले इस युद्ध में सभी सिख सैनिक मारे गए।

लेकिन उनके मरने से पहले वे अफगान सेना बहुत लंबा नुकसान चुके थे। इससे पहले कि अफगानी किले पर कब्जा कर पाते।

अंग्रेजी सेना सारगढ़ी पहुंच गई। जिस कारण अफगानियों को उल्टे पांव भागना पड़ा।

शहीद होने वाले उन 21 जवानों के नाम यह हैं :- ईश्वर सिंह, लाल सिंह ,नायक चंदा सिंह सुंदर सिंह, राम सिंह, उत्तर सिंह ,साहिब सिंह, हीरा सिंह, दया सिंह ,जीवन सिंह, भोला सिंह ,नारायण सिंह ,गुरमुख सिंह ,जीवन सिंह, गुरमुख सिंह, राम सिंह ,भगवान सिंह, बूटा सिंह ,नंद सिंह और जीवन सिंह

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