कोई तलाकशुदा बेटी अविवाहित या विधवा बेटी के समान नहीं हो सकती -सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अनुकंपा के आधार पर यह फैसला सुनाया।

कर्नाटक में किया गया फैसले को रद्द कर दिया।

अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति नियम 1996 का मामला।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के उस फैसले को रद्द करते हुए अपना फैसला सुनाया जिसमें कहा गया था कि

तलाकशुदा बेटी राज्य सिविल सेवा (अनुकंपा आधार पर नियुक्ति नियम) 1996 के उद्देश्यों के लिए विवाहित या विधवा बेटी हो तो वह तलाकशुदा के समान नहीं है।

यह ज्ञात है कि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अनुकंपा के एक मामले में अपना फैसला सुनाते हुए कहा था कि

तलाकशुदा बेटी हो तो वह अनुकंपा के आधार नियुक्ति नियम 1996 के उद्देश्यों के लिए अविवाहित या विधवा बेटी के एक समान इस नियम मे शामिल होगी ।

यह है पूरा मामला-

इसके अंतर्गत वादी की माँ , जो कर्नाटक राज्य में ही जिला कोषागार में द्वितीय श्रेणी सहायक के रूप में कार्य करती थी।

उसकी मृत्यु के बाद याचिकाकर्ता अनुकंपा नियम के अंतर्गत नियुक्ति करने के लिये एक आवेदन कोर्ट में दायर किया था।

उसे इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि तलाकशुदा बेटी के लिए कर्नाटक सिविल सेवा नियम 1996 के नियम 3(2 )के तहत कोई प्रावधान नहीं है।

बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने ही इस फैसले पर विचार करते हुए तलाकशुदा बेटी को अविवाहित या विधवा बेटी के सामान वर्ग की श्रेणी में आएगी।

ज्ञात है कि ही अनूकंपा नियम 1974 शबाना बानो के वाद में उत्तर प्रदेश राज्य के उच्च न्यायालय ने इसके इस मामले में एक तलाकशुदा बेटी को उसके पिता की नौकरी का आदेश पारित करते हुए यह कहा था कि चूंकि वह तलाकशुदा अपने पति से अलग रहती है और बेटी अपने पिता के घर में रहती हैं।

वह अपने पिता से और उनके परिवार से अलग नहीं है। इसलिए उसको उसके पिता की नौकरीे का आदेश पारित गया था।

वर्ष 2020 में वह उत्तर प्रदेश अनुपम अधिनियम, 1974 के अंतर्गत एक सरकारी अस्पताल में अपने पिता के स्थान पर कार्यरत हुई।

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