आखिर गुजरात में मुख्यमंत्री टिक क्यों नहीं पा रहे

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और उनकी जगह नए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल चुने जा चुके हैं।

जो होना था हो गया लेकिन गुजरात में ऐसा क्या है नरेंद्र मोदी के बाद कोई दूसरा मुख्यमंत्री लंबे समय तक नहीं टिक पाया।

इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही मुख्यमंत्री के तौर पर अपने तीन कार्यकाल पूरे किए थे।

नरेंद्र मोदी का आक्रामक प्रचार ही उनको गुजरात के मुख्यमंत्री से भारत के प्रधानमंत्री तक लाया था

लेकिन जब से वे भारत के प्रधानमंत्री बने हैं तब से लेकर आज तक गुजरात में कोई स्थाई मुख्यमंत्री नहीं मिल पाया है।

इस सवाल का जवाब जानने के लिए जब बीबीसी ने गुजरात की राजनीतिक विशेषज्ञों से बात की तब उन्होंने अपने अपने विचार प्रकट किए।

मोदी की इमेज विकास पुरुष की है

गुजरात की राजनीति पर बारीकी से नजर रखने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक जतिन देसाई बताते हैं कि गुजरात की स्थिति का जिम्मेदार वर्तमान मुख्यमंत्री का मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से तुलना करना है।

जतिन देसाई बताते हैं कि जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने खुद को एक विकासवादी पुरुष के तौर पर गुजरात के सामने पेश किया था।

और केंद्रीय नेतृत्व भी उनको पीछे हटाने का प्रयास नहीं करता था जतिन देसाई कहते हैं कि आज मैं और तब में फर्क है।

तब भारतीय जनता पार्टी में लोकतांत्रिक व्यवस्था आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था से ज्यादा सफल थी।

साल 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से गुजरात में ऐसा कोई मुख्यमंत्री नहीं आया जो मोदी की विकासवादी छवि को पीछे छोड़ सके।

जतिन देसाई कहते हैं कि नरेंद्र मोदी एक सामंजस्य बैठाने वाले पुरुष हैं।

उनके कार्यकाल में केंद्रीय नेतृत्व और राज्य राज्य के किसी नेता से ऐसे मतभेद नहीं हुए कि यदि किसी ने कोई विद्रोह किया भी तो नरेंद्र मोदी ने उसका चुपचाप खात्मा कर दिया।

नरेंद्र मोदी नहीं चाहते कि गुजरात से कोई ऊपर उठे

जितेन देसाई के अलावा एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक हरि देसाई हैं। उनके अपने विचार हैं।

उनका मानना है कि नरेंद्र मोदी स्वयं यह नहीं चाहते कि उनके राज्य में कोई और पांव पसार पाए।

हरि देसाई कहते हैं कि विजय रुपाणी का इस्तीफा ले लेना इस बात का पुख्ता सबूत है कि मोदी गुजरात में किसी को जमने नहीं देना चाहते थे।

इसीलिए वे समय-समय पर गुजरात के मुख्यमंत्री बदलते रहते हैं।

इससे पहले भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी इसी रणनीति के तहत मुख्यमंत्रियों की अदला-बदली करती रहती थीं।

उसके पीछे का लोजिक यह था कि ऐसा करके कोई व्यक्ति उनके राजनीतिक कद को चुनौती नहीं दे सकता।

शायद उनके ही नक्शे कदम पर चल कर मोदी और अमित शाह की यही रणनीति अपना रहे हैं।

गुजरात में उलटफेर

पिछले 20 सालों में गुजरात ने अपने कई मुख्यमंत्रियों को आते जाते देखा है।

इस बात की शुरुआत होती है गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल से। केंद्रीय नेतृत्व केशू भाई पटेल से खुश नहीं था।

और इसी बीच भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाकर दिल्ली से भेजा था।

उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपनी विकास पुरुष की छवि को बना लिया।

अपनी इसी छवि के चलते साल 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने।

उनके गुजरात मॉडल के दम पर ही उन्होंने एक लंबे समय बाद देश में भाजपा की स्पष्ट बहुमत से सरकार आई।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनते ही भारत में तो स्पष्ट और स्थिर सरकार आ गई लेकिन इसके बाद गुजरात में स्थिति डांवाडोल हो गई।

जब नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री का पद छोड़ा तब उन्होंने आनंदीबेन पटेल को गुजरात की पहली मुख्यमंत्री बनने का गौरव दिया।

लेकिन उसके 2 साल बाद ही उनसे इस्तीफा यह कह ले लिया गया कि उनकी उम्र 75 साल की हो चुकी है।

लेकिन आंतरिक सर्वेक्षण बताते हैं कि गुजरात भाजपा उनसे नाखुश थी ।इसके बाद नवीन पटेल का नाम गुजरात के मुख्यमंत्री की दौड़ में सबसे आगे चल रहा था।

लेकिन अमित शाह स्वयं दिल्ली से गुजरात मुख्यमंत्री की घोषणा करने आए और उन्होंने विजय रुपाणी को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया।

विजय रुपाणी और उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल के साथ उनके वैचारिक मतभेदों के कारण यह कयास लगाए जा रहे थे कि रूपाणी बहुत जल्द अपने पद से इस्तीफा दे देंगे और

आखिरकार 11 सितंबर 2021 को उन्होंने अपना कार्यकाल 5 साल पूर्ण होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया।

उनके इस्तीफा देने के बाद ही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में भूपेंद्र पटेल को गुजरात का नया मुख्यमंत्री बना कर भेज दिया।

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